Friday, 16 January 2015

दिल्ली का इतिहास

दिल्ली का इतिहास

इंद्रप्रस्थ में थी पांडवों की राजधानी

दिल्ली का इतिहास महाभारतकाल से शुरू होता है। पुराने किले के पास इंद्रपत नाम का गांव था। माना जाता है कि पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ वहीं थी। इंद्रप्रस्थ की नींव पर ही मुगल शासक हुमायूं ने पुराना किला बनवाया था। नीली छतरी और निगमबोध इलाके में भी इंद्रप्रस्थ से जुड़े कुछ साक्ष्य हैं।

पहला शहर लालकोट जिसे तोमर राजा ने बसाया

दस्तावेजी इतिहास में दिल्ली के बारे में पहला जिक्र 737 ईसवीं में मिलता है। तब राजा अनंगपाल तोमर ने इंद्रप्रस्थ से 10 मील दक्षिण में अनंगपुर बसाया। यहां दिल्ली का गांव था। कुछ बरस बाद उस पर राजा ने लालकोट नगरी बसाई। लेकिन दिल्ली का गांव का नाम चलता रहा। कहा जाता है कि हुमायूं ने बाद में इसी नींव पर पुराना किला बनवाया। 1180 में चौहान राजा पृथ्वीराज तृतीय ने किला राय पिथौरा बनाया। किले के अंदर ही कस्बा बसता था। दीवारें 6 मीटर तक चौड़ी और 18 मीटर तक ऊंची थीं। लेकिन मोहम्मद गोरी ने उन्हें हरा दिया और भारत में तुर्कों की एंट्री हो गई।

दूसरा शहर

मोहम्मद गोरी के बेटे शहाबुद्दीन ने गद्दी संभालने के बाद अपने भरोसेमंद सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को कमान सौंप दी। ऐबक ने 1206 में दिल्ली से तख्त शुरू किया। उसने कुतुब महरौली बसाई। यह दिल्ली का दूसरा शहर था। चार साल बाद ऐबक की घोड़े से गिरकर मौत हो गई। ऐबक का दामाद इल्तुतमिश दिल्ली का सुल्तान बन गया। बाद में उसकी बेटी रजिया सुल्तान दिल्ली की शासक बनी।

तीसरे शहर सिरी में खिलजी ने किए सारे इंतजाम

रजिया सुल्तान के बाद कुतुब की सल्तनत खत्म हो गई। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी गद्दी पर बैठा। उसने सोना लुटाते हुए दिल्ली में प्रवेश किया। मंगोल शासकों ने जब हमला किया तब खिलजी ने उसके सैनिकों के सिर कलम कर दीवारों में चुनवा दिए थे। इस वजह से उसके किले का नाम सिरी पड़ा। खिलजी ने रेवेन्यू सिस्टम बनाया। फौज और बाजारों पर उसका ध्यान था। अस्पताल भी बनवाए। इन कामों में लगे लोग सिरी फोर्ट के अंदर ही रहते थे। किले के अंदर ही पूरे शहर के लिए इंतजाम थे। यह दिल्ली का तीसरा शहर था।

चौथा शहर

खिलजी कमजोर हुए तो 1320 में तुगलक दिल्ली में आ जमे। गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलकाबाद किले और गयासपुर के आसपास शहर बसाया। यह चौथा शहर था। यह दौर तुगलक से ज्यादा मशहूर सूफी निजामुद्दीन औलिया और उनके शागिर्द अमीर खुसरो की वजह से जाना गया। औलिया तो महबूब-ए-इलाही कहलाए। वहीं, खुसरो ब्रजभाषा को अरबी-फारसी में पिरोकर हिंदवी जुबान को रंगते रहे। उन्होंने बंदिशें लिखीं। राग गढ़े। सितार और तबले जैसे साज़ बनाए। दिलचस्प पहेलियों वाले सुखन लिखे। कव्वाली भी शुरू कराई। औलिया ने तुगलक वंश के सात और खुसरो ने पांच सुल्तानों को देखा।

पांचवां शहर था फिरोजशाह कोटला

गयासुद्दीन तुगलक के बाद मोहम्मद बिन तुगलक सुल्तान बना। वह राजधानी को कुछ दिन दौलताबाद ले जाने के बाद दिल्ली लौट आया। उसके बाद उसके चाचा सुल्तान फिरोजशाह तुगलक गद्दी पर बैठे। फिरोजशाह ने यमुना के किनारे कोटला बसाया। यहां 18 गांव थे। 10 हमाम, 150 कुएं थे। उसने 30 महल बनवाए। कुतुब मीनार को दुरुस्त कराया। पांच नहरें बनाईं। 1388 में उसका निधन हुआ।

तैमूर ने दिल्ली को तीन दिन-तीन रात तक लूटा

तैमूर लंग ने 1398 में दिल्ली पर हमला किया। तीन दिन-तीन रात तक लूटपाट हुई। फिरोजशाह के शानदार शहर को खंडहर बना दिया गया। हजारों लोगों के सिर कलम कर दिए गए। लेकिन तैमूर ज्यादा वक्त नहीं टिक पाया। लाेदियों ने उसे खदेड़ दिया। बहलोल और सिकंदर के बाद इब्राहिम लोदी ने दिल्ली को बसाया और खूबसूरत बनाया। लेकिन शहर फिरोजशाह के आसपास का ही रहा।

छठा शहर
इब्राहिम लोदी को मुगलों के संस्थापक बाबर ने हरा दिया। लोदी जंग में मारा गया। बाबर आगे बढ़ गया लेकिन मुगलों के लोग वहां जमे रहे। बाबर ने आगरा को राजधानी बनाया लेकिन उसकी मौत के बाद हुमायूं दिल्ली आ गया। पुराने किले के आसपास के शहर को हुमायूं ने दीन पनाह नाम दिया। 1539 में शेर शाह सूरी ने हुमायूं को जंग में खदेड़ दिया और दीनपनाह को शेरगढ़ बना दिया। बंगाल से पेशावर तक सड़क उसी ने बनवाई थी जो बाद में ग्रैंड ट्रंक रोड कहलवाई। रुपया भी सूरी ने ही चलाया था।

सातवां शहर

शेर शाह सूरी की 1545 में मौत हो गई। 1555 में हुमायूं फिर दिल्ली आया। शेरगढ़ को फिर दीनपनाह बना दिया। सात महीने बाद उसकी मौत हो गई। हुमायूं के बेटे अकबर ने राजधानी आगरा में बनाई। जहांगीर और शाहजहां के समय भी आगरा ही मुगलों की राजधानी रही। लेकिन
शाहजहां ने बाद में दिल्ली का रुख किया और यमुना किनारे शाहजहानाबाद की नींव रखी। यह दिल्ली का सातवां शहर था। उसी ने 1638 में लाल किला बनवाया। 46 लाख रुपए में अपना तख्त-ए-ताऊस बनवाया। जामा मस्जिद बनवाई। चांदनी चौक बसा। मीना बाजार बना।

1739 में दिल्ली में हुआ कत्ल-ए-आम
मुगल शासक मोहम्मद शाह के वक्त ईरान से आए नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला कर दिया। वह तख्त-ए-ताऊस भी अपने साथ ले गया। उसकी मचाई मारकाट में दिल्ली के 30 हजार लोग मारे गए। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी की एंट्री हुई।

अंग्रेज मजबूत होते गए और दिल्ली के मुगल शासक सिमटते गए। 1803 में दिल्ली भी अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गई। 1857 की क्रांति में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को ही नेता घोषित किया गया। उन्होंने लिखा- गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की। लेकिन जफर को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके दो बेटों का कत्ल कर दिया गया। दिल्ली में अंग्रेजों ने कत्ल-ए-आम किया। बिल्कुल नादिर शाह की तरह। जफर को अंग्रेज रंगून ले गए। मौत के बाद उन्हें वहीं दफन कर दिया गया।

यह दिल्ली के बसने का आखिरी दौर था जो 1911 से शुरू हुआ और नई दिल्ली कहलाया। इसके लिए दिल्ली दरबार बुराड़ी में सजाया गया। राजाओं को न्योता दिया गया। हजारों लोगों के ठहरने और खाने-पीने के चंद दिनों के इंतजाम लिए बुराड़ी में अस्थायी शहर बस गया। दिल्ली रोशनी से जगमगा उठी। जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी की सवारी चांदनी चौक से गुजरी। दिल्ली दरबार में आकर जॉर्ज पंचम ने दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान कर सभी राजाओं को चौंका दिया। इसके बाद एडविन लुटियंस ने शानदार इमारतें बनाईं। इनमें वाइसराय हाउस यानी राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट शामिल है। इसे 29 हजार मजदूरों ने बनाया। शाही इमारतों के लिए धौलपुर, भरतपुर और आगरा से पत्थर मंगवाए गए। पत्थर ढोने के लिए अलग रेल लाइनें बनाई गईं। हर्बर्ट बेकर ने संसद भवन बनवाया।

Saturday, 10 January 2015

मैं हूँ आपका राष्ट्रध्वज (मैं आपका अपना राष्ट्रध्वज बोल रहा हूँ)



मैं हूँ आपका राष्ट्रध्वज

प्यारे भारतवासियों,


मैं आपका अपना राष्ट्रध्वज बोल रहा हूँ। गुलामी की काली स्याह रात के अंतिम प्रहर जब स्वतंत्रता का सूर्य निकलने का संकेत प्रभात बेला ने दिया, तब 22 जुलाई 1947 को भारत की संविधान सभा के कक्ष में पं. जवाहरलाल नेहरू ने मुझे विश्व एवं भारत के नागरिकों के सामने प्रस्तुत किया, यह मेरा जन्म-पल था।

मुझे भारत का राष्ट्रध्वज स्वीकार कर सम्मान दिया गया। इस अवसर पर पं. नेहरू ने बड़ा मार्मिक भाषण भी दिया तथा माननीय सदस्यों के समक्ष मेरे दो स्वरूप- एक रेशमी खादी व दूसरा सूती खादी से बना- प्रस्तुत किए। सभी ने करतल ध्वनि के साथ मुझे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रध्वज के रूप में स्वीकार किया।

इससे पहले 23 जून, 1947 को मुझे आकार देने के लिए एक अस्थायी समिति का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष थे डॉ. राजेन्द्रप्रसाद तथा समिति में उनके साथ थे मौलाना अबुल कलाम आजाद, के.एम. पणिक्कर, श्रीमती सरोजिनी नायडू, के.एम. मुंशी, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी और डॉ. बी.आर. आम्बेडकर। विस्तृत विचार-विमर्श के बाद मेरे बारे में स्पष्ट निर्णय लिया गया।

मेरे रंग-रूप, आकार, मान-सम्मान, फहराने आदि के बारे में मानक तय हुए। अंततः 18 जुलाई 1947 को मेरे बारे में अंतिम निर्णय हो गया और संविधान सभा में स्वीकृति प्राप्ति हेतु पं. जवाहरलाल नेहरू को अधिकृत किया, जिन्होंने 22 जुलाई 1947 को सभी की स्वीकृति प्राप्त की और मेरा जन्म हुआ।

21 फीट लंबाई और 14 फीट चौड़ाई। यह राष्ट्रध्वज का सबसे बड़ा आकार है जो मानक आकारों में शामिल है लेकिन इसे आज तक कहीं फहराया नहीं गया है। आजादी के समय न तो इतने विशाल भवन थे और न इतना बड़ा कहीं दंड था कि इस ध्वज को फहराया जा सके। वर्तमान में विशाल भवनों के निर्माण के बाद संभव है कि इस आकार के ध्वज को भविष्य में कहीं फहराया जाए।

आजादी के दीवानों के बलिदान व त्याग की लालिमा मेरी रगों में बसी है। इन्हीं दीवानों के कारण मेरा जन्म संभव हुआ। 14 अगस्त 1947 की रात 10.45 पर काउंसिल हाउस के सेंट्रल हॉल में श्रीमती सुचेता कृपलानी के नेतृत्व में 'वंदे मातरम्‌' के गायन से कार्यक्रम शुरू हुआ।

संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व पं. जवाहरलाल नेहरू के भाषण हुए। इसके पश्चात्‌ श्रीमती हंसाबेन मेहता ने अध्यक्ष राजेन्द्रप्रसाद को मेरा सिल्क वाला स्वरूप सौंपा और कहा कि आजाद भारत में पहला राष्ट्रध्वज जो इस सदन में फहराया जाएगा, वह भारतीय महिलाओं की ओर से इस राष्ट्र को एक उपहार है। सभी लोगों के समक्ष मेरा यह पहला प्रदर्शन था। 'सारे जहाँ से अच्छा' व 'जन-गण-मन' के सामूहिक गान के साथ यह समारोह सम्पन्न हुआ।

पंडित नेहरू ने मेरे मानक बताए, जिन्हें आपको जानना जरूरी है (जिनका उल्लेख भारतीय मानक संस्थान के क्रमांक आई.एस.आई.-1-1951, संशोधन 1968 में किया गया)। उन्होंने कहा भारत का राष्ट्रध्वज समतल तिरंगा होगा। यह आयताकार होकर इसकी लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 2:3 होगा, तीन रंगों की समान आड़ी पट्टिका होगी। सबसे ऊपर केसरिया, मध्य में सफेद तथा नीचे हरे रंग की पट्टी होगी। सफेद रंग की पट्टी पर मध्य में सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ का चौबीस शलाकाओं वाला चक्र होगा, जिसका व्यास सफेद रंग की पट्टी की चौड़ाई के बराबर होगा।

मेरे निर्माण में जो वस्त्र उपयोग में लाया जाएगा, वह खादी का होगा तथा यह सूती, ऊनी या रेशमी भी हो सकता है, लेकिन शर्त यह होगी कि सूत हाथ से काता जाएगा एवं हाथ से बुना जाएगा। इसमें हथकरघा सम्मिलित है। सिलाई के लिए केवल खादी के धागों का ही प्रयोग होगा। नियमानुसार मेरे लिए खादी के एक वर्ग फीट कपड़े का वजन 205 ग्राम होना चाहिए।

मेरे निर्माण के लिए हाथ से बनी खादी का उत्पादन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के एक समूह द्वारा पूरे देश में मात्र ‘गरग’ गाँव में किया जाता है जो उत्तरी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में बेंगलूर-पूना रोड पर स्थित है। इसकी स्थापना 1954 में हुई, परन्तु अब मेरा निर्माण क्रमश: ऑर्डिनेंस क्योरिंग फैक्टरी शाहजहाँपुर, खादी ग्रामोद्योग आयोग मुम्बई एवं खादी ग्रामोद्योग आयोग दिल्ली में होने लगा है। निजी निर्माताओं द्वारा भी राष्ट्रध्वज का निर्माण किए जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन मेरे गौरव व गरिमा को दृष्टिगत रखते हुए यह जरूरी है कि मुझ पर आई.एस.आई. (भारतीय मानक संस्थान) की मुहर लगी हो।

मेरे रंगों का अर्थ भी स्पष्ट है। केसरिया रंग साहस और बलिदान का, सफेद रंग सत्य और शांति का तथा हरा रंग श्रद्धा व शौर्य का प्रतीक है। चौबीस शलाकाओं वाला नीला चक्र 24 घंटे सतत्‌ प्रगति का प्रतीक है और प्रगति भी ऐसी जैसे कि नीला अनन्त विशाल आकाश एवं नीला अथाह गहरा सागर।

विशेष परिस्थिति

राष्ट्रीय उल्लास के पर्वों पर अर्थात्‌ 15 अगस्त, 26 जनवरी के अवसर पर किसी राष्ट्र विभूति का निधन होता है तथा राष्ट्रीय शोक घोषित होता है, तब मुझे झुका दिया जाना चाहिए, लेकिन मेरे भारतवासियों इन दिनों सभी जगह कार्यक्रम एवं ध्वजारोहण सामान्य रूप से होगा, लेकिन जहाँ जिस भवन में उस राष्ट्र विभूति का पार्थिव शरीर रखा है, वहाँ उस भवन का ध्वज झुका रहेगा तथा जैसे ही पार्थिव शरीर अंत्येष्टि के लिए बाहर निकालते हैं, वैसे ही मुझे पूरी ऊँचाई तक फहरा दिया जाएगा।

शवों पर लपेटना

राष्ट्र पर प्राण न्योछावर करने वाले फौजी रणबाँकुरों के शवों पर एवं राष्ट्र की महान विभूतियों के शवों पर भी मुझे उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए लपेटा जाता है, तब मेरी केसरिया पट्टी सिर तरफ एवं हरी पट्टी जंघाओं की तरफ होना चाहिए, न कि सिर से लेकर पैर तक सफेद पट्टी चक्र सहित आए और केसरिया और हरी पट्टी दाएँ-बाएँ हों। याद रहे शहीद या विशिष्ट व्यक्ति के शव के साथ मुझे जलाया या दफनाया नहीं जाए, बल्कि मुखाग्नि क्रिया से पूर्व या कब्र में शरीर रखने से पूर्व मुझे हटा लिया जाए।

नष्टीकरण

अमानक, बदरंग कटी-फटी स्थिति वाला मेरा स्वरूप फहराने योग्य नहीं होता। ऐसा करना मेरा अपमान होकर अपराध है, अतः वक्त की मार से जब कभी मेरी ऐसी स्थिति हो जाए तो मुझे गोपनीय तरीके से सम्मान के साथ अग्नि प्रवेश दिला दें या वजन/रेत बाँधकर पवित्र नदी में जल समाधि दे दें। इसी प्रकार पार्थिव शरीरों पर से उतारे गए ध्वजों के साथ भी करें।

मेरा अपमान

मुझे पानी की सतह से स्पर्श कराना, भूमि पर गिराना, फाड़ना, जलाना, मुझ पर लिखना तथा मेरा व्यावसायिक उद्देश्य से उपभोक्ता वस्तु पर प्रयोग अपराध होता है। मुझे झुकाना भी मेरा अपमान कहलाता है।

आप सभी का स्वाभिमान,
प्यारा तिरंगा राष्ट्रध्वज

Wednesday, 31 December 2014

2014 भारत: क्या-क्या रहा ख़ास


2014 भारत: क्या-क्या रहा ख़ास..





इस साल भारत को एक नया प्रधानमंत्री और नोबल पुरस्कार मिला. साथ ही देश ने मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक एक सैटेलाइट स्थापित किया.

साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया.

लेकिन, इनके अलावा कुछ दुखद घटनाएं भी सुर्खियों में रहीं. भारत प्रशासित कश्मीर में भयानक बाढ़ आई तो विभिन्न क्षेत्रों के कई नामी लोग इस वर्ष हमारे बीच नहीं रहे.
साल भर सुर्खियों में रही घटनाएँ -
मोदी की जीत

मई में हुए आम चुनावों में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिली. भारत में पिछली 30 साल में पहली बार किसी दल को अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला.

एलके आडवाणी और एमएम जोशी जैसे वयोवृद्ध नेताओं को नज़रअंदाज़ किए जाने के बावजूद और अन्य दलों के भारी विरोध के बीच मोदी ने अमरीकी चुनावों की तर्ज पर प्रचार करते हुए भाजपा को जीत दिलाई.

महत्वपूर्ण है कि गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके 'विवादास्पद रिकॉर्ड,' उनके कार्यकाल में हुए 2002 के गुजरात दंगों में एक हज़ार लोगों के मारे जाने (जिनमें अधिकतर मुसलमान थे) के बावजूद उनके नेतृत्व में भाजपा को बहुमत मिला और वे 26 मई को प्रधानमंत्री बने.

कांग्रेस को मिली ऐतिहासिक हार और लोकसभा में उसकी सीटों का आंकड़ा 44 पर पहुँच गया.
केजरीवाल का इस्तीफ़ा

दिल्ली विधानसभा में शानदार प्रदर्शन (28 सीटें) के बाद कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से केवल 49 दिनों बाद इस्तीफ़ा दे दिया.

विधानसभा में भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक पारित करवाने की कोशिश में कांग्रेस और भाजपा से समर्थन न मिलने की वजह से केजरीवाल ने सत्ता छोड़ दी थी.

लेकिन लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) महज चार सीटें जीत सकी.

विश्लेषकों का कहना है कि आम चुनाव में इस झटके का एक अहम कारणअरविंद केजरीवाल का दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना था.

'आप' का उदय 2011 में उठे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद हुआ था, जिसने असर देश में कई जगहों पर देखने को मिला था.

पिछली फ़रवरी में विधानसभा में भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक न पास हो पाने के बाद केजरीवाल ने सत्ता छोड़ दी थी.
मंगल मिशन

अंतरिक्ष तकनीक में भारत को बड़ी सफलता 2014 में मंगल मिशन के रूप में मिली. भारत के मार्स ऑर्बिटर मिशन - मंगलयान ने 24 सितम्बर को लाल ग्रह की कक्षा में चक्कर लगाना शुरू कर दिया.

पहली ही कोशिश में मंगल की कक्षा में सफलता पूर्वक अपने सैटेलाइट स्थापित करने वाला भारत दुनिया पहला देश बना गया.

इस मिशन की सफलता और अपनी विशेषज्ञता के लिए भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन (इसरो) को सभी देशों से तारीफ़ मिली.

सफल मंगल मिशन चलाने वाले देशों की सूची में अमरीका, रूस और यूरोप के बाद भारत का नाम भी जुड़ गया.
नोबल पुरस्कार

यह साल इसलिए भी याद किया जाएगा क्योंकि भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ताकैलाश सत्यार्थी को पाकिस्तान की शिक्षा कार्यकर्ता मलाला यूसुफ़ज़ई के साथ नोबल पुरस्कार मिला.

साठ वर्षीय सत्यार्थी एक गैर-सरकारी संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' चलाते हैं जो भारत में बालश्रम को रोकने के लिए काम करती है.

सत्यार्थी की पहल से भारत में बंधुआ मज़दूरी करने वाले 80,000 से ज़्यादा बच्चों को मुक्ती दिलाने में मदद मिली.

पुरस्कार समारोह के दौरान सत्यार्थी ने कहा, "अपने बच्चों को सपने देखने से रोकने से बड़ी कोई हिंसा नहीं है. मैं इस बात को मानने से इनकार करता हूं किगुलामी का बंधन आज़ादी की तमन्ना से अधिक मजबूत हो सकता है."
पोलियो मुक्त भारत

पोलियो के खिलाफ़ भारत का लंबा संघर्ष अंततः मार्च में सफल हुआ. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आधिकारिक रूप से भारत को 'पोलियो मुक्त' देश का दर्जा दे दिया.

विश्लेषकों के अनुसार, भारत की ख़स्ताहाल सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को देखते हुए यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है.

पोलियो के खिलाफ़ मिली इस सफलता का श्रेय उन स्वास्थ्य महकमों और टीकाकरण टीमों की अथक कोशिशों को दिया गया, जिन्होंने एक दशक तक व्यापक अभियान चलाया.
कश्मीर में बाढ़

भारत प्रशासित कश्मीर में सितम्बर में आई भयानक बाढ़ से कम से कम 270 लोगों की मौत हो गई, जबकि हजारों अब भी बेघर हैं.

राज्य में बड़े पैमाने पर राहत और बचाव कार्य के लिए भारतीय सुरक्षा बलों को लगाया गया था.

पिछले 60 सालों में आई इस सबसे भयानक बाढ़ में पूरे के पूरे गांव डूब गए और भारतीय सुरक्षा बलों में राज्य में बड़े पैमाने पर बचाव कार्य किए.

राजधानी श्रीनगर तक के मुख्य इलाके पानी में डूब गए और लोग बचाव टीमों के इंतज़ार में अपने घरों की छतों पर खड़े दिखे.
भारत का 29वां राज्य

सालों तक चले हिंसक आंदोलनों को बाद नए 29वें राज्य तेलंगाना को बनाने के लिए दो जून को आंध्र प्रदेश का विभाजन किया गया.

राज्य में हुए चुनावों के बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के नेता के चंद्रशेखर राव ने नए राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण किया.

राव और उनकी पार्टी ने अलग राज्य के लिए 14 सालों तक संघर्ष किया और नया राज्य बनाने के लिए इस आंदोलन को फैलाया.

तेलंगाना के लोगों ने नए राज्य के गठन की खुशी मनाई, जबकि सीमांध्र और रायलसीमा के लोगों ने निराशा व्यक्त की.
जो चले गए...लेखक एवं पत्रकार ख़ुशवंत सिंह (1915-2014)

वर्ष 2014 में भारत ने कई क्षेत्रों की विशिष्ट हस्तियों को खो दिया.

हिन्दी लेखक अमरकांत, मराठी कवि नामदेव ढसाल, कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति, अंग्रेजी लेखक ख़ुशवंत सिंहइस साल हमारे बीच नहीं रहे.

प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सितारा देवी, कार्टूनिस्ट प्राण, फ़िल्म कलाकार देवेन वर्मा, तमिल फ़िल्म निर्माता-निर्देशक के बालचंदर का भी इस साल निधन हुआ.

न्यायविद एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्णा अय्यर और पत्रकारबीजी वर्गीज भी हमारे बीच नहीं रहे.

योग गुरु बीकेए अयंगर का 20 अगस्त को 95 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. भारत के बाहर ख़ासकर अमरीका में योग को लोकप्रिय बनाने का श्रेय अयंगर को दिया जाता है.

Tuesday, 30 December 2014

क्या है एक्साइज ड्यूटी



क्या है एक्साइज ड्यूटी

एक्साइज टैक्स या एक्साइज ड्यूटी एक ऐसा टैक्स है जो देश के अंदर गुड्स के प्रोडक्शन और उसकी बिक्री पर लगता है। अब इस टैक्स को सेन्ट्रल वैल्यू ऐडेड टैक्स (CENVAT) के नाम से जाना जाता है। इसकी सहायता से सरकार के लिए अधिक से अधिक रेवेन्यू जनरेट किया जाता है, ताकि सार्वजनिक सर्विसेस में उसका इस्तेमाल किया जा सके।

मुख्य बातें


-एक्साइज ड्यूटी 26 जनवरी 1944 को अस्तित्व में आया था।

-1957 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री टी टी कृष्णामाचारी ने एक्साइज ड्यूटी को 400 फीसदी तक बढ़ा दिया था।

पिछले बजट में कितनी थी एक्साइज ड्यूटी

- एक्साइज ड्यूटी के रेट 12 प्रतिशत को बरकरार रखा गया।

भारत में तीन प्रकार की सेन्ट्रल एक्साइज ड्यूटी होती है-

बेसिक- एक्साइज ड्यूटी 1944 के सेन्ट्रल एक्साइज एंड साल्ट एक्ट के सेक्शन 3 के तहत नमक को छोड़कर भारत में बनाए गए अन्य सभी एक्साइजेबल गुड्स पर लगाया जाती है। यह टैक्स सेट्रल एक्साइज टैरिफ एक्ट, 1985 के तहत लगाया जाता है, जो बेसिक एक्साइज ड्यूटी की कैटेगरी में आते हैं।

एडीशनल- एडीशनल ड्यूटीज ऑफ एक्साइस एक्ट 1957 के सेक्शन 3 के तहत इसमें लिस्टेड गुड्स पर एक्साइज ड्यूटी लगाई जाती है। यह टैक्स केंद्र और राज्य सरकार के बीच में बंट जाता है, जिसे सेल्स टैक्स से अलग लगाया जाता है।

स्पेशल- इसके तहत कुछ स्पेशल तरह के वस्तुएं आती हैं, जिन पर एक्साइज ड्यूटी लगाई जाती है। जिन भी स्पेशल वस्तुओं पर एक्साइज ड्यूटी लगाई जानी है, उनका उल्लेख पहले से ही फाइनेंस एक्ट में किया जाता है।

एक्साइजेबल गुड्स क्या हैं

एक्साइजेबल गुड्स वह सारी वस्तुएं हैं जो सेंट्रल एक्साइज टैरिफ एक्ट 1985 के पहले और तीसरे शेड्यूल के अंतर्गत आती हैं। इन सभी पर एक्साइज ड्यूटी लगती है, जिसमें नमक भी निहित है।

किसे एक्साइज ड्यूटी देना जरूरी है?

किसी भी वस्तु को बनाने या पैदा करने वाले व्यक्ति पर एक्साइज ड्यूटी लगती है। इसमें 3 तरह की पार्टी को मैन्युफैक्चरर कहा जा सकता है-

- जो खुद वस्तुओं को मैन्युफैक्चर करें।
- जो कर्मचारी रखकर उनसे मैन्युफैक्चरिंग करवाएं।
- जो किसी तीसरी पार्टी से गुड्स मैन्युफैक्चर करवाए।

क्या मैन्युफैक्चर की गई सभी वस्तुओं पर एक्साइज ड्यूटी देना जरूरी है?

यदि कोई वस्तु एक्साइज ड्यूटी के छूट की कैटेगरी में नहीं है तो उस पर एक्साइज ड्यूटी देना बहुत ही जरूरी है। उदाहरण के लिए निर्यात की गई वस्तुओं पर ड्यूटी नहीं लगाई जाती है। इसी तरह कुछ स्थितियों में एक्साइज ड्यूटी से छूट मिलती है जैसे किस तरह का कच्चा माल इस्तेमाल किया गया है, एक वित्त वर्ष में टर्नओवर क्या है, किस तरह की प्रक्रिया से वस्तु को बनाया गया है।

एक्साइज ड्यूटी न देने पर क्या होगा?

सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी के कई सारे सेक्शन के अनुसार टैक्स चोरी करने पर फाइन लगाया जा सकता है, जो कुल एक्साइज ड्यूटी की राशि का 25-50 प्रतिशत तक हो सकता है।

Wednesday, 24 December 2014

पंडित मदन मोहन मालवीय से जुड़े कुछ किस्से

पंडित मदन मोहन मालवीय का व्यक्तित्व जुदा किस्म का था। वे कोई संकल्प कर लेते थे तो पूरी जिद के साथ उसे पूरा करते थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना। पढ़िए इससे जुड़े कुछ किस्से

1. कुंभ के मेले में मिली चंदे की प्रेरणा-

पंडित मदन मोहन मालवीय एक बार त्रिवेणी संगम पर कुंभ के मेले में थे। वहां उन्होंने लोगों को बताया कि वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते हैं। यह सुनकर एक वृद्धा सामने आई। उसने अपने योगदान के रूप में पंडित मालवीय को एक पैसा दिया। वहीं से पंडित मालवीय को यह प्रेरणा मिली कि वे चंदा इकट्‌ठा कर विश्वविद्यालय बना सकते हैं।

2. निजाम की जूती लेकर चारमीनार पहुंच गए -

पंडित मालवीय द्वारा 4 फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रख दी गई थी। लेकिन इसे विकसित करने के मकसद से चंदा जुटाने के लिए पंडित मालवीय पूरे देश का दौरा कर रहे थे। वे हैदराबाद पहुंचे। निजाम से मिले। लेकिन निजाम ने उन्हें मदद करने से इनकार कर दिया। पंडित मालवीय हार मानने वाले नहीं थे। वे जिद पर अड़े रहे। इस पर निजाम ने कहा कि मेरे पास दान में देने के लिए सिर्फ अपनी जूती है। पंडित मालवीय राजी हो गए। महामना निजाम की जूती ले गए और हैदराबाद में चारमीनार के पास उसकी नीलामी लगा दी। निजाम की मां चारमीनार के पास से बंद बग्‍घी में गुजर रही थीं। भीड़ देखकर जब उन्होंने पूछा तो पता चला कि कोई जूती 4 लाख रुपए में नीलाम हुई है और वह जूती निजाम की है। उन्हें लगा कि बेटे की जूती नहीं इज्‍जत बीच शहर में नीलाम हो रही है। उन्होंने फौरन निजाम काे सूचना भिजवाई। निजाम ने पंडित मालवीय को बुलवाया और शर्मिंदा होकर बड़ा दान दिया।

एक और कहानी यह है कि निजाम के इनकार के बाद जब पंडित मालवीय महल से बाहर आए तो पास ही एक शव-यात्रा गुजर रही थी। जिस व्यक्ति का निधन हुआ था वह हैदराबाद का धनी सेठ था। शव-यात्रा के दौरान गरीबों को पैसा बांटा जा रहा था। पंडित मालवीय ने भी हाथ आगे बढ़ा दिया। एक व्यक्ति ने उनसे कहा कि लगता तो नहीं कि आपको इस पैसे की जरूरत है। इस पर वे बोले- भाई क्या करूं? तुम्हारे निजाम के पास तो मुझे देने के लिए कुछ नहीं है। खाली हाथ काशी लौटूंगा तो क्या कहूंगा कि निजाम ने कुछ नहीं दिया? ... इसके बाद निजाम ने उन्हें बुलवाया और मदद की। पेशावर से लेकर कन्‍याकुमारी तक महामना ने विश्वविद्यालय के लिए करीब एक करोड़ 64 लाख रुपए का चंदा इकट्‌ठा किया था।

3. दिनभर में जितनी जमीन नापी, उतनी दान में मिली

दान के साथ-साथ पंडित मालवीय को विश्वविद्यालय के लिए जमीन की भी दरकार थी। एक बार वे काशी नरेश के गंगा स्नान के समय घाट पर पहुंच गए। काशी नरेश डुबकियां लगाकर बाहर आए तो मालवीयजी ने जमीन मांग ली। नरेश ने कहा कि दान तो दूंगा लेकिन एक शर्त है कि सूरज ढलने तक लंबाई-चौड़ाई में जितनी जमीन पैदल चलकर नाप सकेगो, उतनी ही जमीन मिलेगी। पंडित मालवीय राजी हो गए। जितना हो सका, उतनी जमीन नाप ली और विश्वविद्यालय के लिए दान में ले ली।

4. जब 155 भारतीयों को फांसी से बचाया

मालवीयजी ने 1893 में कानून की पढ़ाई पूरी की। फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत करने लगे। 4 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले स्थित चौरी चौरा थाने को दो हजार से ज्यादा गांव वालों ने घेर लिया। ब्रिटिश राज के दमन के विरोध में उन्होंने थाने में आग लगा दी। इसमें 24 सिपाही जलकर मर गए। इस मामले में अंग्रेज हुकूमत ने 170 भारतीयों को फांसी की सजा सुनाई। लेकिन 151 लोगों को पंडित मालवीय ने कानूनी मुकदमा जीतकर फांसी से बचा लिया।

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भारत रत्न

भारत रत्न

भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है 'भारत रत्न'। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान, सार्वजनिक सेवा और खेल शामिल है। इस सम्मान की स्थापना 2 जनवरी 1954 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। अन्य अलंकरणों के समान इस सम्मान को भी नाम के साथ पदवी के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। प्रारम्भ में इस सम्मान को मरणोपरांत देने का प्रावधान नहीं था, यह प्रावधान 1955 में बाद में जोड़ा गया। तत्पश्चात 12 व्यक्तियों को यह सम्मान मरणोपरांत प्रदान किया गया। सुभाष चन्द्र बोस को घोषित सम्मान वापस लिए जाने के उपरान्त मरणोपरान्त सम्मान पाने वालों की संख्या 11 मानी जा सकती है। एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है।


पदक

मूल रूप में इस सम्मान के पदक का डिजाइन 35 मिमि गोलाकार स्वर्ण मैडल था। जिसमें सामने सूर्य बना था, ऊपर हिन्दी में भारत रत्न लिखा था और नीचे पुष्प हार था। और पीछे की तरफ राष्ट्रीय चिह्न था। फिर इस पदक के डिजाइन को बदल कर तांबे के बने पीपल के पत्ते पर प्लेटिनम का चमकता सूर्य बना दिया गया। जिसके नीचे चांदी में लिखा रहता है 'भारत रत्न' और यह सफेद फीते के साथ गले में पहना जाता है।

अब तक 43 व्यक्तियों को इस रत्न से सम्मानित किया जा चुका है।

सम्मानित व्यक्तित्व

1. डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन - 1954
2. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी- 1954
3. डॉक्टर चन्द्रशेखर वेंकटरमण- 1954
4. डॉक्टर भगवान दास- 1955
5. सर डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेक्ष्वरय्या- 1955
6. पं. जवाहर लाल नेहरु- 1955
7. गोविंद वल्लभ पंत- 1957
8. डॉ. धोंडो केशव कर्वे - 1958
9. डॉ. बिधन चंद्र रॉय- 1961
10. पुरुषोत्तम दास टंडन- 1961
11. डॉ. राजेंद्र प्रसाद- 1962
12. डॉ. जाकिर हुसैन- 1963
13. डॉ. पांडुरंग वामन काणे- 1963
14. लाल बहादुर शास्त्री- 1966
15. इंदिरा गांधी- 1971
16. वराहगिरी वेंकट गिरी- 1975
17. के.कामराज - 1967
18. मदर टेरेसा- 1980
19. आचार्य विनोबा भावे- 1983
20. खान अब्दुल गफ्फार खान - 1987
21. एम जी आर- 1988
22. डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर- 1990
23. नेल्सन मंडेला- 1990
24. राजीव गांधी- 1991
25. सरदार वल्लभ भाई पटेल- 1991
26. मोरारजी देसाई - 1991
27. मौलाना अबुल कलाम आजाद- 1992
28. जेआरडी टाटा- 1992
29. सत्यजीत रे- 1992
30. अब्दुल कलाम- 1997
31. गुलजारी लाल नंदा- 1997
32. अरुणा आसफ अली- 1997
33. एम एस सुब्बुलक्ष्मी- 1998
34. सी सुब्रामनीयम- 1998
35. जयप्रकाश नारायण- 1998
36. पं. रवि शंकर- 1999
37. अमृत्य सेन- 1999
38. गोपीनाथ बोरदोलोई- 1999
39. लता मंगेशकर- 2001
40. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां- 2001
41. पं.भीमसेन जोशी- 2008
42. सी.एन.आर.राव- 2013
43. सचिन तेंदुलकर- 2013

2014 के सम्मानित व्यक्तित्व होंगे

अटल बिहारी वाजपेयी
मदन मोहन मालवीय




मदन मोहन मालवीय

मदन मोहन मालवीय

मदन मोहन मालवीय को बुधवार को भारत रत्न देने की घोषणा कर दी गई. मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 को इलाहाबाद में हुआ था. 1884 में इन्होंने बीए की डिग्री हासिल की और उसी साल कुमारी देवी से इन्होंने मिर्जापुर में शादी भी की. आइए जानते हैं

मालवीय के बारे में 12 खास बातें...

पहले ऐसे शख्स जिन्हें मिली महामना की उपाध‍ि

1. मालवीय बचपन से अपने पिता की तरह भागवत की कहानी कहने वाले यानी कथावाचक बनना चाहते थे मगर गरीबी के कारण उन्हें 1884 में सरकार विद्यालय में शिक्षक की नौकरी करनी पड़ी.

2. पूरे भारत में ये अकेले ऐसे शख्स हैं जिन्हें महामना की उपाध‍ि दी गई.

3.1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 144 धारा का उल्लंघन करने के कारण गिरफ्तार कर लिया था.

4. डा. राधा कृष्णन ने मालवीय के संघर्ष और परिश्रम के कारण उन्हें कर्मयोगी कहा था.

5. 1898 में सर एंटोनी मैकडोनेल के सम्मुख हिंदी भाषा की प्रमुखता को बताते हुए, कचहरियों में इस भाषा को प्रवेश दिलाया.

6. मदन मोहन मालवीय के बारे में जब भी बात की जाती है तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) का जिक्र जरूर किया जाता है.
इन्होंने इसकी स्थापना 1916 में की.

7. मालवीय 1919 से 1938 तक बीएचयू के वाइस चांसलर रहे.

8. वे चार बार 1909,1918, 1930, 1932 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे.

9. 1924 से 1946 तक वे हिंदुस्तान टाइम्स के चेयरमैन रहे.

10. मालवीय ने रथयात्रा के मौके पर कलाराम मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाया था और गोदावरी नदी में हिंदू मंत्र का जाप करते हुए स्नान के लिए भी प्रेरित किया.

11. 'द लीडर' अंग्रेजी अखबार की 1909 में स्थापना की. जो इलाहाबाद से प्रकाशित होता था.

12. मालवीय 1961 तक मेंबर ऑफ पार्लियामेंट रहे.